Tuesday, December 05, 2006

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसीं...

मेरे आंगन की दीवार फ़ांद कर कल शाम एक बादल मेरे घर आया। मैं दरवाज़ा खोलकर उससे मिलने गया तो उसने मुझे गले लगाया, और मैंने एक अजब ऊंस महसूस की! हम दोनों साथ टहलने निकले, बात पर बात चलती गयी और ज़िंदगी जैसे नज़र के सामने से कुछ पलों में ही बीत गयी और यह पता चला की और कई काज करने तो बाकी ही हैं! ख्वाहिशों ने अपनी आवाज़ जगायी और सपनों ने कई चेहरे लेकर रात की महफ़िल में सितारे बिखेरे।

उस वक्‍त मेरे ख़यालों पर जैसे कोई धुंद सी नशे की तरह छायी हुई थी। पर मैं धुंए के पार एक तारे को ढूंढ रहा था। उस तारे की धुन में मैं अपने रास्ते से कई बार कदम मोड़ कर ना जाने कहां चला, पर वह तारा हमेशा मुझसे उतना ही दूर था जितना वह अब है। उस बादल ने बस मुझे मेरी ज़मीन से मुलाका़त करवा दी, फिर एक बार...

और तब मैंने एक सितारेको गिरते हुए देखा - और मैंने बस यही चाहा : उसे भी अपनी ज़मीन मिल जाये!

Sunday, November 19, 2006

मैं हवा के परों पे कहां जा रहा हूं कहां...


आसमां के पार शायद और कोई आसमां होगा

आसमां के पार शायद और कोई आसमां होगा

बादलों के परबतों पर कोई बारिश का मकां होगा

मैं हवा के परों पे कहां जा रहा हूं कहां

कभी उडता हुआ, कभी मुडता हुआ

मेरा रास्ता चला, ओ हो हो हो...

मैं हवा के परों पे कहां जा रहा हूं कहां

मेरे पांव के तले की ये ज़मीं चल रही है

कहीं धूप ठंडी ठंडी

कहीं छांव जल रही है

इस ज़मीं का और कोई आसमां होगा

होगा आसमां,

आसमां होगा

मैं हवा के परों पे कहां जा रहा हूं कहां

इन लंबे रास्तों पर सब तेज़ चलते होंगे

इन लंबे रास्तों पर सब तेज़ चलते होंगे

कापी के पन्नों की जैसे यहां दिन पलटते होंगे

शाम को भी सुबह जैसा क्या समा होगा

होगा क्या समा

क्या समा होगा

मैं हवा के परों पे कहां जा रहा हूं कहां

आसमां के पार शायद और कोई आसमां होगा

बादलों के परबतों पर कोई बारिश का मकां होगा

हो मैं हवा के परों पे कहां जा रहा हूं कहां

कभी उडता हुआ, कभी मुडता हुआ

मेरा रास्ता चला, ओ हो हो हो...

मैं हवा के परों पे कहां जा रहा हूं कहां

मैं हवा के परों पे कहां जा रहा हूं कहां

मैं हवा के परों पे कहां जा रहा हूं कहां



Saturday, November 11, 2006

फिर बम्बई!


सारों को घर लौटते देखने के बाद अब मेरी बारी थी, और मैं खेल की इस पारी को निभानेको चल पडा घर की ओर... इस दुनिया में बहुत कम जगहें होती हैं जिन्हें हम घर कह पाएं और बम्बई एक ऐसा ही बसेरा है जिसे हर कोई घर कहना चाहता है, कह पाता है। यहां हर एक को इक मुट्ठी आसमान और इक टुकडा झमीन का चाहे ना मिले, पर बम्बई में शायद ही कोई ऐसा होगा जो बिल्कुल ही भूखा सोता होगा - यह शहर सभी को रोटी देनेकी फितरत रखता है। मेरा सफ़र ज़रूरत से कुछ ज़्यादा ही लंबा रहा, घर की ओर चलते चलते - पर जब में यहां आया तो इस शहर ने ना ही अपनी सूरत बदली थी, ना सीरत। सब कुछ वैसा ही था जैसा मैं ने जाने से पहले देखा था। ज़मीन पर रेंगती हुई सडकों पर हज़ारों समंदरों के बहाव की तरह चलती भीड में खोनेको मैं लौट कर आया था। और अगले ही दिन मैं इस जगह से अपनी पुरानी पहचान कायम करने को निकला।

सबसे पहले मैं मरीन ड्राइव पहुंचा, शहर के दरिया से मिलने और कुछ घंटे लहरों को देखते देखते बिता दिए। शायद कई कहानियां गुज़रे हुए इस साल में इन लहरों में उठकर समा गयी होंगी और किसी ने उन्हें महसूस तक नहीं किया होगा। किनारे पर बैठे बैठे मैं अपनी सांसों में शहर की मैली हवा को भरकर पत्त्थर पर रेंगते हुए दरिया के बाशिंदों की शहर से जुड्ने-अलग होने की असमंजस देखकर मैं अपने आपकी तुलना उनसे करने लगा। क्या यह अनजानों का बसेरा मेरा भी "घर" है? वास्तविकता की लहरों ने मुझे घेरते हुए यह याद दिलाया कि इस बसेरे में मैं भी यहां उतना ही अजनबी हूं जितने सारे और! शायद मैं औरों से भी ज़्यादा अजनबी हो चुका हूं इस बसेरे से अब... पर अब भी पहचान के कई छोर किसी कोने से बाहर नज़र आ रहे थे, जब मैंने यहां की सडकों से दुआ-सलाम की।

एक एक कडी जोडनेको मैं बम्बई की अलग अलग जगहों से फिर मिलने चल पडा। तो पहले जाकर कुछ पेट पूजा की जाए! चर्चगेट स्टेशन के सामने सत्कार रेस्ट्रां में जब मैं बैठा तो भीड इतनी थी कि हर मेज़ पर ३- ४ अनजान लोगों को बिठाकर उनकी महमान-नवाज़ी की जा रही थी! मैंने अपना ऒर्डर दे दिया था और खाना आनेका इंतज़ार कर रहा था, तब तक एक बंबैया - माफ़ी सरकार, मुंबैया... - भाईसाहब ने मेरे सामनेकी कुर्सी में तशरीफ़ फ़रमाई। कुछ देर तक मेरी ओर देखने के बाद साहब ने एक लंबी-चौडी मुस्कान धरते हुए मुझे पूछा कि मुझे नेकटाई - गले का फ़ंदा- बांधने आता है या नहीं। अब मैं तो निकला ही था इस बसेरे से जान-पहचान बढानेको! मैंने उन साहब का फ़ंदा बांध दिया तो उन्होंने मुझे मॆंगोला के फ़ायदे बताए, और चल पडे! फिरसे मैं अपनी मेज़ पर अकेला था, और मेरा खाना आ गया। अब बारी थी एक मोटे तगडे साहब की - वह जैसे ही आकर मेरे सामनेवाली कुर्सीमें बैठे कि मुझसे पूछ बैठे: "भाईसा'ब, यह जो आपने खाना मंगवाया है, उसे क्या कहते हैं?" मैं झरा सा चकरा ही गया, लेकिन मैं बिना किसी विलंब के सही जवाब दे पाया: "मसाला उत्तप्पम"। अब भाई एक सेवक को पुकारने लगे: "श..श...श एय एय भाई, ज़रा इधर आना... मेरे लिये एक मसाला उत्तप्पम ले आना... और सुनो, सांभर कि दो वाटी ले आना... और सांभर गाढा मत बनाना, मेरे लिये पतला चाहिये है...।" यह सब इतनी ऊंची आवाज़ में हुआ कि सारे होटल में लोग हमारी मेज़ की तरफ़ देखने लगे थे। मैंने किसी तरह अपनी पेट पूजा का समापन किया और वहां से निकला।

दिन भर मैं भीडभरी रेल में एक छोर से दूसरे छोर घूमता रहा रात होने तक, और फिर मेरे मुसाफ़िरखाने कि ओर चल पडा। देर रात, एक तरफ लोग अपनी गाडियां लिये शहर की रौनक का नज़ारा लेने चले थे तो दूसरी ओर सडक के किनारों पर रहनेवाले अपने दिनका लेखा-जोखा कर रहे थे। कहीं रेस्ट्रांवाले साफसफ़ाई करके दिनभर की थकान दूर कर रहे थे, और आनेवाले कल का सामान जुटा रहे थे, तो कहीं कोई अपने धंदे की बोहनी करनेकी राह देख रहे थे। ऐसे एक साहब को मैंने मेरे घर छोड देनेको कहा, और रिक्शा चलाते ही वह भी अविरत बोलने लगे! मुझ पर सवालों की झडी बरसी, और ऐसा लगने लगा कि उस समय उन साहब से ज़्यादा मेरी फ़िक्र किसी और को हो ही नहीं सकती! बातों बातों में उन्हों ने यह जान लिया कि मैं अपनी तकदीर का दांव आज़मा रहा हूं बम्बई में नौकरी ढूंढने आकर, और मुझे कई रास्ते बताये अपनेआपको व्यस्त रखनेके। फिर बात आयी कर्मयोग के महत्व की, और कलियुग में घटते हुए कर्मयोगियों की! और तब तक मेरा मकाम आ गया। मैं जब साहब को पैसे देकर चलने ही लगा की उन्होंने मुझसे पूछा: "भाईसा'ब, दवा कंपनी में काम करोगे क्या आप? मेरे एक रेगुलर पैसेंजर हैं जो किसी दवा कंपनी में ऊंची पोस्ट पर काम करते हैं..." यह सुनते ही मुझे बस एक गीत गुनगुनानेका मन किया -

माना अपनी जेबसे फ़कीर हैं, फिरभी यारों दिलके हम अमीर हैं...
मिटे जो प्यार के लिये वो जिंदगी, जले बहार के लिये वो जिंदगी...

…कहेगा फूल हर कलीसे बार बार, जीना इसीका नाम है!

किसीकी मुस्कुराहटों पे हों निसार, किसीका दर्द मिल सके तो ले उधार,
किसीके वास्ते हो तेरे दिलमें प्यार, जीना इसीका नाम है!

Sunday, September 03, 2006

तुझे मिलेगी मधुशाला...

पथिक बना मैं घूम रहा हूँ,
सभी जगह मिलती हाला,
सभी जगह मिल जाता साकी,
सभी जगह मिलता प्याला,
मुझे ठहरने का, हे मित्रों,
कष्ट नहीं कुछ भी होता,
मिले न मंदिर, मिले न मस्जिद,
मिल जाती है मधुशाला॥




Tuesday, August 29, 2006

अंदर बाहर







अंदर बाहर, बाहर अंदर
        हम हैं जहां वहां जलवे...
                    अपनी आंखों में रहते हैं
                                हरदम जवाँ जवाँ जलवे...










Sunday, August 06, 2006

मां मुझे है सबक याद जो तुमने मुझे सिखाकर भेजा...

यह कविता एक सिपाही के चरित्र को दी गयी है एक हिंदी डॊक्युमेन्ट्री में, जहां यह सिपाही मरते दम तक अपनी मां को यह कहने की कोशिश करता है कि उसने अपनी पीठ पर नहीं, सीने पर गोली खाई है। कई वीर जनेताओं की आंख के तारे हर रोज़ कहीं मिट्टी में मिल जाते हैं अपने मादर-ए-वतन की खातिर, और कई और मांएं हर रोज़ अपने सपूतों को देशके हवाले करती हैं। एक तरफ ऐसे जवान अपनी जान देकर दूसरी जानें बचाते हैं, तो किसी और छोर पर कई आशियाने ढेर किये जाते हैं, कई छोटे से फूलों को खिलने से पहले ही मुरझा दिया जाता है। हमारा सिपाही अब जाते जाते पूछ रहा होगा अपनी मां से, क्या तुमने यह नहीं कहा था मां, कि जिनकी जानें मैं समिधि की तरह हवन करने ला रहा हूं वह सारे भी हमारी ही तरह मिट्टी के घरों में रहते हैं, हमारी तरह ही दो वक्त रोटी खाते हैं, और उसी आसमान से बरसात मांगते हैं जहां से मैंने उनपर आग बरसाई थी... और क्या उनकी मां उनसे यह कहना भूल गयी थी कि जब वह मुझसे मिलेंगे रणभूमि में, तब अंत में हम दोनों के शरीर एक ही जगह गिरेंगे?
पर मां ने तो ऐसी कोई बात ही ना कही थी अपने बेटे से। ना ही मां चाहती है कि उसका बेटा जाकर किसीका घर उजाड कर विजेता बने। हर सरहद की दोनों ओर मांएं एक जैसी ही होती होंगी... और हर मां के लिए हर बेटे का दर्द भी एक बराबर ही होता होगा।



फिर किस मुकाम तक पहुंचने के लिये हम सारे बेटे दौड लगाये हुए हैं? जिस तरह आग तुम्हें जलाएगी, मैं भी उसी तरह भुननेवाला हूं, धमाके की आवाज़ जैसी तुम्हें सुनाई देगी, वैसी ही मुझे भी महसूस होगी। और मुस्कान जिस तरह तुम्हें सुकून देती है, मुझे भी उसी तरह प्यारी है। और कितने बेटे हमें बलिवेदी पर चढाने हैं, क्या यह हमारे ही हाथ नही है?

Monday, July 31, 2006

मेरे ही घर में रेहता है, मुझ जैसा ही जाने कौन...


मुंह की बात सुने हर कोई, दिलके दर्द को जाने कौन
आवाज़ों के बाज़ारों में, खामोशी पेहचाने कौन

सदीयों सदीयों वही तमाशा रस्ता रस्ता लंबी खोज
लेकिन जब हम मिल जाते हैं, खो जाता है जाने कौन

वो मेरा आईना है या मैं उसकी परछांई हूं
मेरे ही घर में रेहता है, मुझ जैसा ही जाने कौन

किरन किरन अलसाता सूरज, पलक पलक खुलती नींदें
धीमे धीमे बिखर रहा है, झर्रा झर्रा जाने कौन

मुंह की बात सुने हर कोई, दिलके दर्द को जाने कौन
आवाज़ों के बाज़ारों में, खामोशी पेहचाने कौन

- निदा फ़ाज़ली
This song is a sufi form of music, called a Ghazal. An approximate translation is given below.

Everyone hears what is told,
but who would know what’s in the heart
In those brothels of noises,
who would reckon what is not told?

Each century is the same old play
every path is the same old search
But when we find each other,
would we know what we lost?

Is he my reflection or am I his shadow?
Who’s that,
just like me,
who lives in my house?

As the sun hides with every ray,
as every eye is losing sleep
Who is it that is dispersing,
bit by bit,
everywhere?

Everyone hears what is told,
but who would know what’s in the heart
In those brothels of noises,
who would reckon what is not told?
- Nida Fazli

I remembered this song, from an old Hindi serial, which was relayed on the DD network, back home, called Neem Ka Ped. It starred Pankaj Kapoor, and this title song was sung by Jagjeet Singh. A search for the lyrics took me to the blog of Aimless Wanderer, where I found it.


The song echoes in my head, in my heart as I hear the warheads marching toward each other, everywhere, and we don’t really know where we are all heading. And I wouldn’t name anyone right or anyone wrong, as I too could not claim myself to be a lighthouse of piety, of sanity, in the ocean of turmoil, turbulence, intolerance, and never ending hatred. Can I go away from this place, to where there is no war?

||छठां पाण्डव||

एक सवेरे किसी कुंता ने एक बच्चे को गंगा की गोद में बहा दिया था। वह उस दैवी बच्चे के साथ कैसे दुनिया का सामना करती? वह बच्चा जो कानों में कुण्डल और अंग पर आभूषण धारण करके जन्मा था, उसे नाम दिया गया कर्ण। एक सारथी ने उसे पाला, बडा किया, परशुराम ने उसे पढाया, और 'असत्य और अधर्म के सूत्रधार' दुर्योधन ने उसे अंगराज बनाया। अधिरथ को कोइ आवश्यकता नहिं थी कर्ण को पालनेकी, एक बहते हुए बच्चे को पानी से निकाल कर उसे जीवनदान करनेकी। और उस दानवीर बालक का भाग्य भी हमेशा उससे कुछ ना कुछ मांगता ही रहा। मां, राधा-अधिरथ, मैत्री, कुण्डल, आभूषण, कवच, परिवार, और अंत में जीवन।


क्या कुंता को अपने इस पुत्र से उसे जन्म देनेका कर्ज मांगनेका अधिकार था? क्या अर्जुन सत्य और धर्म के साथ था जब वह एक निःसहाय योद्धा का वध कर रहा था? कर्ण ने एक काम गलत किया था शायद, अभिमन्यु के वध में कौरवों का साथ देकर, पर क्या उसका दायित्व नहिं था उस मैत्री का बदला देनेका जिसने उसे एक व्यक्तित्व और पहचान दी थी? महाभारत में एक संवाद यह भी है जहां कर्ण माधव से बिनति करता है, कि माधव कर्ण के कुंतीपुत्र होने की बात छुपाकर रखें, क्योंकी अगर युधिषठिर को इस बात का ग्यान होगा तो वह अपना राज्य कर्णको सौंप देगा, और कर्ण उसे मैत्री में विवश हो कर दुर्योधन को सौंप देगा। कर्ण को भी अपने प्राण से अधिक धर्म ही प्रिय था, इस बात की पुष्टी यहां होती है। फिर क्यों हर दिन कोइ छठां पाण्डव मार गिराया जाता होगा सत्य और धर्म के नाम पर? और क्यों किसी अधिरथ के बेटे को किसी अभिमन्यु का रक्त 'वीरों' के लिये बहाना पडता होगा?