हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसीं...
मेरे आंगन की दीवार फ़ांद कर कल शाम एक बादल मेरे घर आया। मैं दरवाज़ा खोलकर उससे मिलने गया तो उसने मुझे गले लगाया, और मैंने एक अजब ऊंस महसूस की! हम दोनों साथ टहलने निकले, बात पर बात चलती गयी और ज़िंदगी जैसे नज़र के सामने से कुछ पलों में ही बीत गयी और यह पता चला की और कई काज करने तो बाकी ही हैं! ख्वाहिशों ने अपनी आवाज़ जगायी और सपनों ने कई चेहरे लेकर रात की महफ़िल में सितारे बिखेरे।
उस वक्त मेरे ख़यालों पर जैसे कोई धुंद सी नशे की तरह छायी हुई थी। पर मैं धुंए के पार एक तारे को ढूंढ रहा था। उस तारे की धुन में मैं अपने रास्ते से कई बार कदम मोड़ कर ना जाने कहां चला, पर वह तारा हमेशा मुझसे उतना ही दूर था जितना वह अब है। उस बादल ने बस मुझे मेरी ज़मीन से मुलाका़त करवा दी, फिर एक बार...
और तब मैंने एक सितारेको गिरते हुए देखा - और मैंने बस यही चाहा : उसे भी अपनी ज़मीन मिल जाये!
उस वक्त मेरे ख़यालों पर जैसे कोई धुंद सी नशे की तरह छायी हुई थी। पर मैं धुंए के पार एक तारे को ढूंढ रहा था। उस तारे की धुन में मैं अपने रास्ते से कई बार कदम मोड़ कर ना जाने कहां चला, पर वह तारा हमेशा मुझसे उतना ही दूर था जितना वह अब है। उस बादल ने बस मुझे मेरी ज़मीन से मुलाका़त करवा दी, फिर एक बार...
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4 Comments:
अरे भाई आप इतना अच्छा हिन्दी ब्लॉग लिखते हैं पर हिन्दी ब्लॉगर्स जगत में क्यों शामिल नहीं हैं
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